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भागलपुर: ड्यूचेन मस्कुलर डिस्ट्रोफी (डीएमडी) एक ऐसी असाध्य बीमारी है जो मांसपेशियों को धीरे-धीरे कमजोर और सूखा देती है। अगर यह बीमारी किसी मध्यमवर्गीय या निम्नवर्गीय परिवार के सदस्य को हो, तो पूरा परिवार प्रभावित हो जाता है। भागलपुर में एक ऐसा ही दिल दहला देने वाला मामला सामने आया है, जिसमें एक ही परिवार के दो बच्चों को डीएमडी ने जकड़ लिया है। इस संकट से उबरने के लिए शिक्षक घनश्याम कुमार और उनका परिवार प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से सपरिवार इच्छा मृत्यु की मांग कर रहे हैं।
नवगछिया के कदवा कार्तिकनगर के निवासी घनश्याम कुमार के दो बेटों अनुराग (10 वर्ष) और अनिमेष (15 वर्ष) को इस जानलेवा बीमारी ने जकड़ लिया है। पिछले 12 साल से घनश्याम कुमार दोनों बच्चों का इलाज करा रहे हैं, लेकिन लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। उनका कहना है कि बच्चों का इलाज करने के लिए उन्हें 10 करोड़ रुपये की आवश्यकता है, लेकिन सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिल रही है।
घनश्याम कुमार कहते हैं कि वह और उनका परिवार इस असहनीय दर्द से गुजर रहे हैं, और अब उनकी आखिरी उम्मीद प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से है। उन्होंने कई बार महामहिम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर अपने बच्चों के इलाज के लिए सहायता की अपील की है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री और मंत्रियों को भी लिखा है, लेकिन अब तक किसी तरह की सहायता नहीं मिल पाई है।
हाल ही में, 19 फरवरी को घनश्याम कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने बताया कि उनके दोनों बच्चों को ड्यूचेन मस्कुलर डिस्ट्रोफी के इलाज के लिए पीटीसी ट्रांसलारा (ATALUREN) दवाई की आवश्यकता है। यह दवाई एफडीए द्वारा 2014 में अप्रूव हो चुकी है और 33 देशों में उपलब्ध है। हालांकि, भारत में यह दवाई अभी तक नहीं मिल पाई है। दिल्ली के एम्स अस्पताल का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग द्वारा धनराशि उपलब्ध कराए जाने पर ही यह दवाई मिल सकती है, लेकिन अभी तक ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है।
बच्चों की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है, और घनश्याम कुमार ने फिर से अपने पत्र में लिखा है कि यदि सरकार उनकी मदद नहीं कर सकती तो उन्हें और उनके परिवार को एक साथ मृत्यु दे दी जाए, क्योंकि अब बच्चों की तड़प देखी नहीं जाती। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार में इस बीमारी का इलाज उपलब्ध नहीं है, और बच्चों को इलाज के लिए दिल्ली ले जाना पड़ता है, जहां उनके पैर घिस चुके हैं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।
इस बीमारी के बारे में बात करें तो यह एक अनुवांशिक बीमारी है, जिसमें मांसपेशियों में पाया जाने वाला एक प्रोटीन डिस्ट्राफिन काम करना बंद कर देता है। इससे बच्चों को चलने-फिरने, खाने-पीने, शौचालय जाने और सांस लेने में परेशानी होती है। दुनिया भर में करीब 3500 में से एक बच्चा इस बीमारी का शिकार होता है। भागलपुर में 20 से ज्यादा बच्चे इस बीमारी से ग्रस्त हैं, और कई बच्चों की मौत हो चुकी है।